कहते इश्क़ इबादत है इश्क़ खुदा है।
खोया भूलभुलैया में तो इश्क़ पाया है।
कर बैठे नादानी ढूंढा कि प्यार क्या है।
या खुदा ये आग का दरिया जन्नत है।
कहीं ना कहीं तो आग जरूर लगी है।
धुंआ है तो आग उठना लाजिमी है।
इश्क कभी नजरो से छुप न सका है।
प्रेम तो इबादत का नायाब तरीका है।
बता दो आपका उनसे रिश्ता क्या है।
आज हर कोई खुले में पूछने लगा है।
चेहरे की सरगोशियां छुप न सकी है।
आपकी खामोशियाँ कुछ कह रही है।
वाक़िफ़-ए-उल्फ़त जमाना रहे सही।
नादान इकरार उलझन का सबब है।
सरेआम मत कर देना इज़हार कहीं।
उल्फत की आबरू दांव पर लगी है।
#सुरेश_गुप्ता
स्वरचित

