न कहे कोई दो लफ्जो में बयान करे।
कितना मुश्किल है कोई थोड़े में कहे।
माइक से बोले जनाब दो शब्द कहेंगे।
माइक जो मिला तो दो घंटे कम पड़े।
महाकवि के कानों में गूंजे थे वे शब्द।
अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः पर लिखते।
कवि ने इस पर तीन महाकाव्य रचे।
कुमार सम्भव, रघुवंश मेघदूत लिखे।
पलट कर जब कथाकारों को देखा।
महीनों तक संभाषण चलता ही रहा।
दो लफ्ज कुछ ज्यादा ही लंबा हुआ।
वैरागी संत मौन में बयान कर गए।
बात जब भी हुई थी मोहब्बत की।
तीन अक्षर ही बहुत कुछ कह गए।
और जब जब इश्क़ रूमानी हुआ।
लब सिले रहे अक्ष ने इतिहास रचे।
#सुरेश_गुप्ता
स्वरचित

