धारणा बनाते बनाते अरसा गुजरता गया।
कभी दूर लगे कभी नजदीक नजर आया।
अंदर झाँका नही वो मेरा ब्लेक बॉक्स था।
कहां ढूंढा नही मंदिरो मजारों में हो आया।

घूमता रहा फिरता रहा गांव शहर वनों में।
देख न पाया कभी घर की चार दीवारों में।
खोल देता आंखे मेरे करीब नजर आया।
गरीब बुजुर्ग या मां बाप के रूप में आया।

जिस किसी ने जैसा चाहा वैसा उसे देखा।
जिसने जहां जैसा देखा उसने वैसा पाया।
सकाम निष्काम में चर अचर में भी देखा।
घट घट में वटवृक्ष में प्राणी मात्र में पाया।

कहाँ कहाँ नही ढूंढा अंदर न झाँक पाया।
कहीं नही मिला दिल की गहराई में पाया।
कब धारणा ही बना पाया कहां था खुदा।
क्या कभी देख पाया मैं ही था मेरा खुदा।

#सुरेश_गुप्ता
स्वरचित