इन बूढ़ी आंखों में अब जान कहां थी।
प्यास ही थी मैं आंख दौडाता रह गया।
वो कहता लौट आएगा मैं बाट देखता।
आँख गडाकर बैठा नजरे पथरा गयी।

आंख न उठती थी वो भाषण झाड़ता।
जब वो आंखे तरेरता दिल डूब जाता।
आंखो में सरूर था वो भी मगरूर था।
निहारती राहे आज आंखे पथरा गयी।

आंख मे पानी नही आंखो मे खटकता।
इन आंखो मे वह तो धूल झोंक जाता।
आंखों देखी ऐसी आंखो में गडता रहा।
ढूंढता रहता ‌‌‌आंख से ओझल हो गया।

‌‌‌आंखो मे आंखे डाल क्या बात करता।
आंखो मे चरबी छाई सुन कहां रहा था।
अब आँखें मूँद लेता दुनिया छोड़ देता।
आंख डबडबाती गई दिल डूबता गया।

सुरेश_गुप्ता
स्वरचित