पोखर में मछलियां मजे से रहती
ताकतवर मछली राजा बन बैठी
आजादी कम हो गयी दुखी हुई
मगर नियति मानकर चुप भी थी
बाहर से नई नई मछलियां आई
उनके साथ वे दुखी खड़ी हो गयी
राजा को बंदी बना वो राजा बनी
मछलियां सुखी होकर रहने लगी
धीरे धीरे शोषण का दायरा बढ़ा
अति हुई सबको झकझोर दिया
सबने अत्याचारी को भगा दिया
सबने आजादी का जश्न मनाया
बहुत खुश फिर लोकतंत्र आया
सब खाएंगे पिएंगे मौज मनाएंगे
अनुशासन के लिए संविधान रचा
सबने अपना नेता नक्की किया
बगुला एक टांग पर मुस्तेद खड़ा
सबने मिलकर उसे नेता बनाया
उसने सबकी रक्षा का वचन दिया
सब खुश अपना ही शासन हुआ
नेता दायरा धीरे धीरे बढाता गया
संविधान अपने लिए बदल गया
ज्यादा टेक्स ले खुद ख़र्च बढ़ाता
मनमानी कर सब पे हुक्म चलाता
बगुला धीरेधीरे मछलियां खा गया
पोखर के संसाधन भी सुखते रहे
संसाधन का सदुपयोग नही किया
अब बगुला भूख बिलबिलाता रहा
नियति का काल चक्र चलता रहा
निर्बल पर सबल ने शासन किया
किसी भी शक्ल में वह राजा रहा
संसाधन पर हक से शोषण किया

