नभ में बादल आये काली घटाएं छाई।
छप्पर तो वही रहा सिर भी मुंडाया है।
बादल बरसेंगे ओलो की बरसात होगी।
छप्पर ठीक करो बारिश कहर ढायेगी।

सही मौसम से कदम नही मिला पाए।
आंधी तूफान चलेंगे बिजली कड़केगी।
कभी सावन आएगा घटा घिर आएगी।
आपके द्वार भी ईडी सीबीआई आएगी।

मौसम कब किसी का हुआ कब होगा।
वक्त बदलेगा तो अनहोनी कर गुजरेगा।
काट लो घास जब तक सूरज चमकेगा।
फिर नही कर पाओगे मौसम बदलेगा।

घबराहट से दिल डूबेगा ये बाढ़ आएगी।
जतन से जो घरौंदे बनाए बहा जाएगी।
पैदा हुआ धरा पर उसका जाना तय है।
चर अचर सृष्टि में सब धराशायी हुआ है।

#सुरेश_गुप्ता
स्वरचित