आईने में जब झांककर देखता।
हर अक्स में अपने को देखता।

हर अक्स में तजुर्बा अंकित था।
वक़्त मेरी दास्तां लिखता गया।

कारवां बढ़ रहा यही थमा नही। 
वक्त मेरा इतिहास लिखता गया।

आज भी जब देखता मैं आईना।
झुर्रियों में सब रहा लिखा हुआ।

मैं देखता रहा समय ढलता रहा।
और अनुभव भी निखरता गया।

अक्स अपने निशान छोड़ गया।
जब भी मैं आईने झांकता गया।

#सुरेश_गुप्ता
स्वरचित