जिन्दगी के सफर पर , में निकल चूका था ।
प्यार की राह पर ,में इस कदर खो चूका था।
सब रिश्ते नाते भूल चूका था ........
आया वो दौर तो , में सब कुछ खो चूका था।
जब पता चला तो , में कुछ और करने चला था।
अधिकारी बनने की चाहत में , में पढ़ने चला था।
पढ़ने की चाहत में , में अख़बार बन चूका था।
:- सियाराम जाट


