रोटी के लिए निकले थे घर से रोटी के लिए घर को लौटे हैं,
मीलो चले तपती राहों पे मंजिल पे नहीं पहुंचे हैं,
कैसा ये वक्त आया दरबदर भटके हैं,
माथे पर पसीना पैरों में पड़े छाले हैं,
चिलचिलाती धूप में बच्चों को लेकर चलते हैं,
कोई था में हाथों को कोई कंधे पर उठाकर चलते हैं,
कहीं गिरवी रखा गया इनको कभी भूखे पेट सोते हैं,
नींद ने घेरा ऐसा मौत की आगोश में सुलाया है,
चारों तरफ बिखरी थी रोटियां और रक्त के फव्वारे हैं ,
ये कैसी भुखमरी और बेरोजगारी है,
हर तरफ बेबसी और लाचारी है,
किसकी नजर लगी कायनात को,
हर तरफ महामारी है,
रोटी के लिए निकले थे घर से रोटी के लिए घर को लौटे हैं|
--- नर्मदेश्वरी
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