हे शक्ति स्वरूपा नारी,
अब कर में धर शमशीर समर कर।
सती प्रथा थी, पर्दा थी,
है हिंसा अब घर-घर ।
लज्जा ढोते-ढोते लग गया,
ग्रहण इज़्ज़त पर।
अब चक्की, चूल्हा, बच्चा, दुल्हा
ढक पल्लू से घर पर ।
हे शक्ति स्वरूपा नारी,
अब कर मे धर शमशीर समर कर।।
बाहों में बल्टी, बच्चों का बोझ कमर पर,
पावों में छाले, भरी गगरिया सर पर,
नर से माँग रही क्यूँ, हक अपना तू रर कर,
लज्जा, नाजुकता से थोड़ा और उबर कर,
हे शक्ति स्वरूपा नारी,
अब कर मे धर शमशीर समर कर।।
