नज़्म:रोग(1)




मुझे मालूम है

मुझसे,

मेरे इस रोग से

मेरे

सभी अपने परीशाँ हैं,

मेरी

तीमारदारी से

मेरी बीवी

मेरे बच्चे

बहुत तंग आ चुके हैं अब,


ये बिलकुल

साफ़ लिक्खा है

सभी चेहरों पे के

वो अब

बहुत

बे-रब्त हैं मुझसे,

मगर ये फ़र्ज़-ए-आख़िर है

निभाना है...

ज़माना है....

दिखाना है.....


सभी तैयारियां

लगभग

मुकम्मल हो चुकी होंगीं

दवाओं के सभी

खर्चों के

मेरे 'फाइनल बिल' पर

भी 'डिस्कस'

हो चुकी होगी


बड़े बेटे ने

छोटे को

कफ़न की ज़िम्मेदारी

सौंप दी होगी

कहाँ से

कैसे लाना है,

वो खुद

मसरूफ़ होगा

बाद मरने के

मेरे

जो काम होने हैं

उन्हें अंजाम देने में,


जगह भी कब्र की

लगभग

मुकर्रर

हो गयी होगी,


फ़क़त

अब मुंतज़िर हैं सब

कि

किस लम्हे

क़ज़ा आये

कटे ज़ंजीर

जिससे

मैंने

सबको बांध रक्खा है.....!!!


~सिराज फ़ैसल ख़ान

12 जनवरी 2016