नज़्म: आख़िरी दुआ
चौदहवाँ दिन लगातार है
डॉक्टरों की ये आँखों को पढ़ते हुए
नाउमीदी के पारे को चढ़ते हुए
चौदहवाँ दिन है आँखें बिना मास्क के
एक इंसान भी देखने को तरसती हुई,
चौदहवाँ दिन लगातार है
लाल नीली दवाएँ लहू में मुसलसल उतरती हुई...
चौदहवाँ दिन लगातार है
जब आज़ीज़ों की आवाज़ कानों में आयी नहीं,
चौदहवाँ दिन लगातार है
जब किसी ने भी घर की बनी चीज़ कोई भी खायी नहीं...
चौदहवाँ दिन लगातार है
जब क़ज़ा बाल खोले हुए हॉस्पीटल के हर वार्ड में रक़्स करती हुई,
और भयानक हँसी ख़ौफ़ से काँपती ज़िन्दगी के क़रीब आ के हँसती हुई...
चौदहवाँ दिन लगातार है
दर्द से छटपटाते हुए दर्जनों लोग इस हॉस्पीटल में आते हुए,
चौदहवाँ दिन लगातार है
दर्जनों लोग ताबूत में हॉस्पीटल से जाते हुए...
चौदहवाँ दिन लगातार है
मास्क से वार्ड में झाँकती
दर्जनों उन निगाहों में मेरे लिए
कोई उम्मीद, राहत भरी इक ख़बर भी नहीं,
इतने दिन जो दवाएँ रगों में उतरती रहीं, उनका मुझ पर कोई भी असर ही नहीं...
कितना दुश्वार है पास के खाली होते हुए बिस्तरों की तरफ़ देखकर साँस लेना भी यार,
मौत से भी ज़ियादा भयानक है ये मौत का इंतज़ार...
आख़िरी सांस पर
मैंने रब से दुआ की,
दुआ में मेरी काश इतना असर आ सके,
बाद मेरे यहाँ वेंटिलेटर पे जो शख़्स हो लौटकर अपने घर जा सके...!!!
~सिराज फ़ैसल ख़ान
अप्रैल 22, 2020


