समाज की ये मृदुल जंजीर,
बाँध लेती है मन की पीर।
मुस्कान ओढ़े, मुख छुपाए,
जो अलग चले, उसे सताए।
ढाँचे में सबको ढालता है,
फिर भी हर स्वर को टालता है।
सच कहो तो चुभने लगे,
झूठ बोलो तो सबको भले लगे।
फिर भी इसमें ठौर है ढूँढ़ी,
इस क्रूर व्यथा में आशा बूँधी।
ओ समाज, तू पिंजरा भी है,
और उसी में छिपी चाबी भी है।
— प्रणीत सिंह
