तुम हो शीश महल की रानी प्रिय मैं प्यादा जिसका कोई घर-बार नही तुम हो मखमल पर ख़्वाबों को सीने वाली हम तो सोने के भी हक़दार नही अब कैसे होगा मिलन प्रिय ? इसमें सम्भव यह प्यार नही। तुम हो बहता पानी दरिया का, मैं स्थिर जिसकी कोई धार नही तुम हो सुन्दर नोका प्रतिस्पर्धा की, मैं हुँ टूटी नाव जिसकी कोई पतवार नही अब कैसे होगा मिलन प्रिय ? इसमें सम्भव यह प्यार नही। तुम हो तराशी मूरत संगमरमर की, मैं वो पत्थर जिसका कोई आकार नही, तुम हो ऊंचे गुम्बद मीनारों के मैं तुच्छ शिला मेरा कोई आधार नही, अब कैसे होगा मिलन प्रिय ? इसमें सम्भव यह प्यार नही। तुम वो वृक्ष श्रंगरित पुष्पों से, मैं नागफनी जिसपर कोई श्रृंगार नही तू है मधुर संगीत में बहने वाली, मैं रमता जोगी जिसका कोई सार नही अब कैसे होगा मिलन प्रिय इसमें सम्भव यह प्यार नही।