बात यह उन दिनों की है जब,
दिल के जख्म भरे ही नहीं थे
के एक खुशनुमा मोड़ आया
मैंने सोचा अपना ले इसे शायद
अब ये दर्द का कोई नया तोड़ आया
कुछ खास हुआ था उस वक़्त मेरे साथ
एक हसीं चेहरे से मुलाक़ात हुई थी
मुलाक़ात तो एक तरफ़ा ही थी मगर
उन्हें छोड़ कर हर किसी से उनकी बात हुई थी
मैंने सोचा कुछ इस तरह गिरफ्तार हो जाऊं उसकी मोहब्बत में
जैसे तारे अंधेरे के आगोश में होते हैं
बना दूंगा अपने रिश्ते को इतना खूबसूरत जैसे
गुलाब और भी खूबसूरत सुबह की ोस में होते है
फिर ाहेशश हुआ के कही खो न जाये ये कोहिनूर
तो इससे कोई रिस्ता और बनाया जाय
मोहब्बत तो करलूँगा एकतरफा ही मगर
क्यों न इसे एक अच्छा दोस्त बनाया जाये
किसी को ार्ज कर सकूँ दास्ताँ-इ-दर्द
कोई तो एक ऐसा हम दर्द बनाया जाय
काफी असमंजस में था दिल और दिमाग
एक उसकी धड़कनों को खुद में शामिल करना चाहता था
और दूसरा उसकी दोस्ती हासिल करना चाहता था
फिर क्या घंटों चलती रही इस अदालत ने
काफी मसक्कतों के बाद सोचा और ये फैसला सुनाया
मोहब्बत को रखना है एक तरफ किसी तहखाने में
और सजा में उसकी दोस्ती का ता उम्र साथ बताया
दोस्ती एक मुकाम पर चढ़ी ही थी के
के अचानक से एक तूफ़ान आया
उसमें बू थी मोहब्बत की और शायद
हम दोनों के बीच एक तीसरा अनजान आया
बिखेर कर रख दी उसने वो दास्ताँ-इ-दोस्ती की माला
जो हमने बड़े शिद्दत से पिरोयी थी...
मैं तो खुश था मोहब्बत में किसी और के
सिर्फ और सिर्फ मेरी दोस्त ही रोई थी
आज अफ्शोष है उसके उन आंसुओं का
जिनकी वजह मैं था और कभी मैने ही निकले थे
जिसकी मोहब्बत को उसकी दोस्ती से ज्यादा तबज़्ज़ो दी
वो बड़े दिल वाले दिल के बड़े ही काले थे