मैं अक्सर आसमां को देखकर ये सोचता हूं
तमाम तारें हैं उसकी हद में
इक मुकम्मल चांद भी है
फिर वो रोता है किसकी खातिर बारिशों में
ये तो अजब सा मामला है
शायद जो टूटे थे तारे, पास थे इसके
बाकी तारों से ज्यादा ही खास थे इसके
पर सवाल है, ये कुछ दिन ही क्यूं रोता है
बाकी दिन फिर पास में इसके क्या होता है ?
शायद वक्त का मरहम जब जब कम पड़ता है,ये रोता है
अक्सर अपने साथ भी तो ये ही होता है ।।
