कई हिस्सों में मेरी जिंदगी है
कुछ साथ रहती है हमारे 
कुछ गांव के घर में पड़ी है
कुछ शोर में गुम हो गयी है
कुछ शून्य में अटकी पड़ी है 
कुछ दफ्तरों में कैद होकर
घुट गयी है, रह गयी है
कुछ नदियों पहाड़ों में गयी जो
उधर ही मुग्ध होकर बह गयी है 
मैं सबको एक छत की छांव में लाने चला हूं 
मगर ये वक्त दुश्मन बन के मेरा अड़ गया है 
इक वक्त में इक जिंदगी चुनने को कहता है 
इसी कारण मेरा जीवन अधूरा पड़ गया है ।।