(बीतते वक़्त मे लम्हो ने,
ज़ब हमें तौलना शुरू किया..)
अठरह के ज़ब हो चले हम,
वक़्त ने जरा से जोर दिया,
माँ -बाप का हाथ छुड़ाकर,
हमें जरा कमजोर किया..
पहले घर से दूर किया,
फिर थोड़ा मजबूर किया,
दिखाने को सच का आइना,
हमें जरा मशहूर किया...
फिर...
हमें सबसे बिलग किया,
औरो के बिच मे कही,
मानो हम अलग से हो,
सब कुछ जान-समझकर भी,
औरो मे बिलग से हों..
अज्ञानता के ओट मे जैसे,
बचपन के कही चोट मे जैसे,
छिपी हुयी थी सिख कही..
वक्त ने वैसे ही,
धुन पर अपने,
हमें चलाना शुरू किया,
वक़्त की परिभाषा को..
हमें बताना शुरू किया,
ज़ब वक़्त ने हमें,
हर लम्हो मे खरा उतरता पाया..
फिर एक अंतिम कोशिस की,
नए अंदाज मे आजमाया....
क्यूंकि ये बात थी,
भविष्य के निर्माण की..
जीवन के एक नए सफर की,
वक़्त के नए रफ़्तार की..
पाकर एक बार फिर से,
खरा उतरते हर लम्हो मे,
वक़्त ने एक पँख दिए..
उड़ते रहने को जीवन रचना मे..


