मैं मिली नहीं हूँ आजतक तुमसे पर फिर भी,
ना जाने कैसे?
मेरे ख़याल तुम्हारे ख़यालों से मेल खाते हैं।
मेरे तजुर्बे तुम्हारे बयान हो जाते हैं।
हमारे किस्से बेहद अलग सही, हमारी कहानी मिलती है
शख़्सियत के खेल में ज़ुबान एक सी है।
हादसे यूँ तो खूब मशहूर हैं तुम्हारे, पर हालात मेरे भी कभी छुपे नहीं हैं।
जैसे तुम्हें याद है हर बीता लम्हा पल पल के हिसाब से, जैसे किसी ने नाम गुंधवा लिया हो हाथ पे, जिसे अब मिटाया नहीं जा सकता।
मेरी भी यादें वैसे ही पक्की हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
मेरा कहना हर मकान घर हो नहीं सकता, तुम्हारा मानना गुज़रा वक़्त वापिस आया नहीं करता !
और घर किसी जगह का नाम नहीं याद्दाश्त की शतरंज है
उस पर से ये, किसी जगह पर बार बार जाने से, उसे घर बुलाया नहीं जा सकता।
मैं जितनी कोशिशें करती हूँ इन यादों को समेटने की, तुम मुझे वहीँ लाकर खड़ा कर देते हो जहाँ से मेरी शुरुआत हुई थी।
मैं मिली तो नहीं हूँ आजतक तुमसे पर तुम्हें सुनकर लगता है , जैसे कभी हमारी मुलाकात हुई थी।
जिस तरह मेरे ख़याल तुम्हारे ख़यालों से मेल खाते हैं!
-सिमरन भगतानी

