ना जाने हर वक़्त मैं किस
अज़ाब में डूबा हुआ हूं
कभी उसकी याद में तो
कभी उसके ख्वाब में
डूबा हुआ हूं
उसको तो रास आ जाएगी
नयी सी मोहब्बत अब
और एक मैं हूँ की
बस माज़ी के गिर्दाब में
डूबा हुआ हूं
चार घड़ी का विसाल
मयस्सर था मुझे इश्क़ में
उसके बाद तो मत पूछो
बस हिज्र के तेज़ाब में
डूबा हुआ हूं
कैसे करते हैं लोग
बार-बार मोहब्बत
मैं तो एक ज़माने से
बस एक ही शख्स के
आँखों के तालाब में
डूबा हुआ हूं
