बाहें खोले खड़ा है इश्क,
मेरे दिल की दहलीज़ पर
और उससे नज़रें चुरा रही हूँ मैं
कहीं आई न हो हवस,
इश्क का लिबास पहन कर
शायद इसी डर से
उस पर ऐतबार करने से
कतरा रही हूँ मैं
मैं अच्छे से वाकिफ हूँ
इश्क के फ़ितूर से भी
और इसके नासूर से भी
यही वजह है शायद कि
इसकी बुरी नज़र से
दिल को जैसे-तैसे बचा रही हूँ मैं।
