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निस्वर्थता

जहां किया दिल से किया
स्वार्थ का जाल बुना ही नहीं !
माना जो चाहा था
सब कुछ तो हुआ भी नहीं !
कुछ है जो सुना नहीं पाये 
मगर सब कुछ तो सुना भी नहीं !
कितना
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