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निस्वार्थ..

जहां किया दिल से किया 
स्वार्थ का जाल बुना ही नहीं
माना जो चाहा था 
सब कुछ तो हुआ भी नहीं
कुछ है जो सुना नहीं पाये 
मगर सब कुछ तो सुना भी नहीं&nb
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