वो दर्द का मंज़र वो रात भी क्या अजीब थी,
किसी को भी हया थी ना तहज़ीब थी |
वो लड़की सड़क पे पड़ी थी,
मूकदर्शको की टोली सामने खड़ी थी |
लूटी जा रही थी
उसकी जब आब्रू देख कर किसी की भी ना कांपी रूह |
वो बस वही पड़ी कराह रही थी,
मदद की गुहार लगा रही थी |
उसके आँसू की हर बूँद में गहरा दर्द था,
मूकदर्शक बनके भीड़ में खड़ा हर शख़्स ,
अब उसकी नज़र में नामर्द था |
किसी ने ना उठाई आवाज़,
ना सच देखा,
उनके लिए इन सब में उस मासूम का ही कसूर था |
कुछ थे जो बनते थे दुनिया के ठेकेदार,
चरित्र पे सवाल उठाना जिन का काम था |
वहा से निकलने के वो बना रहे थे बहाने हज़ार,
लफ़्ज़ों से निकली उनकी हर बुराई में उस लड़की का ही नाम था |
वो चीख़ी थी चिल्लाई थी
डरी डरी सहमी सी वो इक टूटे फूल सी मुरझाई थी |
एक बजरे सी वो निकली थी,
नये साहिलों की तलाश में |
वो महीन थी,
वो ज़हीन थी,
वो थी आज़ाद परिंदे सी,
अब्र पर चलना ही उसकी मंशा थी |
पर दो पल में उन हैवानों ने उसकी अस्मत को लूट लिया,
वो टूट गयी, वो हार गयी, उसको एक ऐसा मरज़ दिया |
पर मामूली ये बात है इस घटिया समाज़ के लिए |
पहले भी लाखों दामन,
घूमे हैं ऐसे दाग लिए |
फिर भीड़ छ्टी,
सब घर को निकले,
मामला बिल्कुल शांत हुआ |
लड़की को इंसाफ़ ना मिला,
आख़िर ये कैसा इंसाफ़ हुआ |
आख़िर यी कैसा इंसाफ़ हुआ |
आख़िर ये कैसा इंसाफ़ हुआ |