वो दर्द का मंज़र वो रात भी क्या अजीब थी, किसी को भी हया थी ना तहज़ीब थी | वो लड़की सड़क पे पड़ी थी, मूकदर्शको की टोली सामने खड़ी थी | लूटी जा रही थी उसकी जब आब्रू देख कर किसी की भी ना कांपी रूह | वो बस वही पड़ी कराह रही थी, मदद की गुहार लगा रही थी | उसके आँसू की हर बूँद में गहरा दर्द था, मूकदर्शक बनके भीड़ में खड़ा हर शख़्स , अब उसकी नज़र में नामर्द था | किसी ने ना उठाई आवाज़, ना सच देखा, उनके लिए इन सब में उस मासूम का ही कसूर था | कुछ थे जो बनते थे दुनिया के ठेकेदार, चरित्र पे सवाल उठाना जिन का काम था | वहा से निकलने के वो बना रहे थे बहाने हज़ार, लफ़्ज़ों से निकली उनकी हर बुराई में उस लड़की का ही नाम था | वो चीख़ी थी चिल्लाई थी डरी डरी सहमी सी वो इक टूटे फूल सी मुरझाई थी | एक बजरे सी वो निकली थी, नये साहिलों की तलाश में | वो महीन थी, वो ज़हीन थी, वो थी आज़ाद परिंदे सी, अब्र पर चलना ही उसकी मंशा थी | पर दो पल में उन हैवानों ने उसकी अस्मत को लूट लिया, वो टूट गयी, वो हार गयी, उसको एक ऐसा मरज़ दिया | पर मामूली ये बात है इस घटिया समाज़ के लिए | पहले भी लाखों दामन, घूमे हैं ऐसे दाग लिए | फिर भीड़ छ्टी, सब घर को निकले, मामला बिल्कुल शांत हुआ | लड़की को इंसाफ़ ना मिला, आख़िर ये कैसा इंसाफ़ हुआ | आख़िर यी कैसा इंसाफ़ हुआ | आख़िर ये कैसा इंसाफ़ हुआ |