भूख जब लगती है
अंग अंग खाने को तरसता
ठंड जब लगती है
छत के बिना शरीर ठिठुरता।।
अमीरों के काम करने के लिए
यह तो मजबूर है,
दो वक्त का खाना खाता
यह तो मजदूर है।।
काम आता है दूसरों के
देश को यही है बनाता,
हर आंधी तूफान बरसात में
भी निडर काम करता जाता।।
बनाया है इसने
सुंदर सुंदर यह महल अटारियाॅ,
रास्ते भी इसी ने बनाए
ताकि जा सके अमीरों की गाड़ियां।।
खुद के सर छत नहीं
दूसरों का छत बनाता है,
कम ना आंको इसको
पैदल ही मिलो तय कर जाता है।
इसमें नहीं है कोई अचंभ,
देश का है यह 'पांचवा स्तंभ'।।


