मैं देखता हूं

मैं सोचता हूं,

देख कर, सोचता हूं

सोच कर, देखता हूं

बड़ी ही विचित्र छवि हूं

मैं कवि हूं।।


मैं बसता हूं सब में

मैं हंसता हूं सब में,

सब में रोता हूं,

हूं मैं सबके अंदर का शोर

और बात कोई मन में दबी हूं,

मैं कवि हूं।।


मैं राजा, मैं रंक

मैं शुन्य, मैं अंक

मैं रीत पुरानी

और नवीं हूं,

मैं कवि हूं।।


मैं हूं शीतल चंद्रमा

अंत हूं,

अनंत हूं..

मैं धधकता रवि हूं,

मैं कवि हूं।।