लोकतंत्र की दुनिया का

यह कैसा न्याय,

किसी का पलड़ा भारी

कोई असहाय।।


सच का घोटा जाता गला

झूठ फूला ना समाए,

न्यायपालिका जर्जर

अपराधी मौज उड़ाए।।


उद्योगपति को कर्ज रियायत

विदेश भ्रमण आए-जाए,

कर्ज़ से लदा है किसान भी

और कमर टूटती जाए।।


मध्यमवर्ग को कोई ना पूछे

गरीब पर हंसे, अमीर हंसी उड़ाए,

शिक्षा-जगत चिकित्सा-जगत,

सब महंगा

इंसान जाए भी कहां जाए।।


किया भ्रष्टाचार ने तंत्र खोखला

नेता खूब कमाए

जनसेवा को चुना था जिसको

अब जन को ही बेवकूफ बनाए।