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दूध का कर्ज़।

मां तू कहां है?, तू कहां है मां?

जब से तू गई है तुझे ढूंढता फिर रहा हूं,

देख पैरों पर खड़ा हूं, अपने पर तुझ बिन लड़खड़ा के गिर रहा हूं।


चेहरे पर मुस्कान, आंखों में आंसू आज भी रहता है,

जब यह जमाना मुझे काबिल कहता है,

क्योंकि ख्याल उस वक्त मेरे जहन में तेरा रहता है।


नादान था मैं, तेरे दूध का कर्ज चुकाने चला था

मैं मूर्ख, मुझे इतना भी ना पता इसमें मेरा क्या भला था?

एहसास ना था, मां के दूध के एक बूंद ने यह सृष्टि रची है,

मां तू तो त्रिकालदर्शी है, तेरे बिना क्या यह सृष्टि बची है।


वह हंसकर बोली,

अरे पागल, मुझे खुशी तब होगी; जब तू अपनी जिंदगी सुधरेगा,

इतना बड़ा हो गया क्या तू, तू दूध का कर्ज़ उतारेगा।


हां मां, तेरे लिए वह सब करूंगा जो तूने बचपन से किया,

मेरे लिए जो तूने घुट घुट के जिया।

निकल पड़ा कमाने उसे छोड़ कर अकेले, बोला तेरी खुशी वापस लाऊंगा

मैं मूरख, मुझे क्या पता अपने साथ मैं उसकी खुशी भी ले जाऊंगा।


जा रहा था मैं बाहर खड़ी वह द

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