परीक्षा देने का समय
जब बहुत लंबा हुआ,
देखकर प्रश्न का पत्र
मन को अचंभा हुआ।
उड़ गया मेरे चेहरे का रंग
भगवान ने भी छोड़ा मेरा संग,
जो भी आया था रट के
थोड़े में ही भूले भटके।
देखा मैंने दाएं बाएं
लेकिन कुछ नजर ना आए,
मुझको कुछ समझ ना आए
देखते प्रश्न अकल चकराए।
मेरी थी हालत बुरी
अध्यापक की नजर मुझ पर पूरी,
फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाया
मुश्किल से कुछ प्रश्न कर पाया।
सोचा मैंने किया समय बर्बाद
नहीं था तब मैं सचेत,
पर अब पछताए होत क्या
जब चिड़िया चुग गई खेत।
