ढ़लती शाम की ये बारिश
और इस बारिश की बौछारें,
जैसे कोई ट्रक गुजरा हो
उड़ाकर धूल
और फिर यही धूल
चमक रही हो
किसी दूसरे ट्रक की हेडलाइट में;
जैसे ग्वार निकालते थ्रेसर से
उड़ता नीरा हो,
थ्रेसर की जाळियों से
छणकर नहीं
बल्कि आ रहा है नहाकर
ट्यूबलाइट की रोशनी से;
जैसे छोटे-छोटे बीज हो
मतीरे के
जो गिर रहे है मोती संग;
पाणी नहीं बरसा रही
बरसा रही है सावणी
ढ़लती शाम की ये बारिश
और इस बारिश की बौछारें।