ये रातें कितनी अच्छी है !
चाँद जब झाँक रहा होता है
छुपकर खिड़की के कोने से,
उसकी दूधिया रोशनी गिर रही होती है
कोने में बेतरतीब सी रखी किताबों पर,
और किताबें भी ऐसे
गुमसुम दुबकी सी बिल्लियाँ हो जैसे
कि डरा रहा हो उनको
यह सन्नाटा रात का।
सन्नाटा इतना
घड़ी की टिक-टिक भी
लगती है ऐसे
जैसे गर्म लोहे पर
चल रहे हो हथौड़े लुहार के,
सन्नाटा इतना कि स्पष्ट सुनाई दे
दूर बहुत दूर से
विलाप गुजरती रेलगाड़ियों का,
सन्नाटा इतना
गर ध्यान से सुनो
तो सुन सकते हो
अंतिम साँसें भी मरणासन्न रात की।
मरणासन्न रात
रात का वो पहर
जो डराता है सबसे ज्यादा,
रात का सन्नाटा नहीं डराता
डराता है तो केवल
रात का यह अंतिम पहर
क्योंकि खत्म हो जाएगी
अब साँसें रात की,
फिर जिंदा हो जाएंगे दिन
और उनके साथ इंसान भी
जिनमें कोई इंसान नहीं है।
ये रातें कितनी अच्छी है !