फूट आई है बाड़े में गुठलियाँ वो आम की फेंक दिया था मैंने कचरे के ढ़ेर में यूँ ही, जगह-जगह दो-चार दो-चार कोंपलें खड़ी है वो भी ऐसे जैसे कोंपलें नहीं खड़े हो समरभूमि में सहस्त्रों पुत्र राजा सागर के।