पतझङो के मौसम हैं, पत्ते बिखर रहे हैं,

मासूम सी गौरया के घोसले उजङ रहे हैं,

ये जो पर्वत से खङे हैं बिन डगमगाए,

मालूम हो उन्हें कि उन्हें भी दीमक निगल रहे हैं।

डाॅ॰ श्वेता