मिट्टी से सने हुए मेरे बदन पर
शीतल हवाओं से लिपटे चमन पर
आंखों की रोशनी के पार उस अंधेरे में
चकाचौंध की ख़ातिर गुमनाम से सवेरे में
मुस्कुराहट के पीछे छुपे हुए जज्ब़ात में
उन दुखों के भीतर जो मिले हैं खै़रात में
मशहूर चेहरे की मुसलसल गुमनामी में
बुद्धिमान हस्तियों की हर उस नादानी में
ग़म से लिपटे मकान के भीतर
लाशों से सने गोदाम के भीतर
जो अपने दुखों का अंबार लिखता है
मुझे वहां मेरा भारत दिखता है|


