आओ सुनाऊँ एक कहानी
धोती-कुर्ता की नादानी॥
साधारण सा एक लिबास
दिखता रहता, पर वो ख़ास
बिकता रहा, सिल्क व कपास
उसके ऊपर बंडी काश!
पर ना किया कभी उपहास ॥
फिर एक दौर ऐसा भी आया
मुग़लों ने फैलाया राज
आ गए जामा और पजामा
सर पर पगड़ी रख मुग़लों ने
कहा, मेरा तो है यही पहनावा॥
फिर भी चलती रही थी धोती
जाड़े में तन ढक देती थी
गर्मी में, कमर से लटक लेती थी
पर कभी नहीं, तुलना होती थी ॥
-Shweta
