06/16 /2023: अभी पिछले हफ्ते बैंगलोर ट्रेवल कर रही थी पर दिन की शुरुआत ऐसी रही की फ्लाइट मिस हो गयी। अब हुआ यूँ की हमने दूसरी फ्लाइट कराई same day की पर वो बैंगलोर काफी लेट पहुंची। करीब १० बजे थे पर बैगेज लेते हुए and Uber Go की लम्बी कतार में खड़े हुए करीब ११:३० बजे हमें अपनी नंबर की गाडी में बैठने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ। वर्ना लग तो ऐसा रहा था कि सारी रात यहीं एयरपोर्ट पे बितानी पड़ेगी । सुबह कि फ्लाइट मिस होने के बाद एक के बाद एक एडवेंचर करते हुए हम काफी थक चुके थे। थकन के मारे सर में दर्द और अब खड़े खड़े पैरों में दर्द, दोनों ने अपनी व्यथा सुनानी शुरूकर दी तो मैं भी इनसे पीछा छुड़ाने के लिए नींद का आसरा ढूंढने लगी थी । अब ऑफिस की तरफ से होटल जो booked था वहां हमने रिसेप्शन पे कॉल कर के इन्फॉर्म किया कि हम लेट हो जाएंगे। तो भाईसाब, सामने वाले के जवाब में ज़रा भी नरमी ना थी। बड़ी ही बेरुखी से कहा "हाँ आ जाना" और फ़ोन रख दिया । हमें लगा ऐसी भी क्या गलती हमारी, ख़ैर हमने सोचा रात काफी हो गयी है अकेला बंदा कहीं फ़्रस्ट्रेशन के बीच जवाब का रास्ता ढूंढता हुआ फोन उठा कर हामी भरने की ज़ेहमत तो कर ही चूका है। चलो कोई बात नहीं। फिर हमने गौर फ़रमाया कि एयरपोर्ट से हमारे होटल तक के रस्ते में कुछ कमसम दुकाने ही खुली थी जिसकी वजह से सड़क पर चहल कदमी काफी कम थी। कुछ १:३० घंटे तक हमारा ड्राइवर शहर कि सुनसान सड़कों पर अपनी गाडी करीब ७०-८० की रफ़्तार में हाँकता हुआ सीधा Parkwood Suites के पास रुका। हमने पेमेंट पहले ही कर रखी थी तो बैग उतारा और होटल में दाखिल हुए। यहाँ हमारी मुलाकात होटल के रिसेप्शनिस्ट से होती है जिनसे कुछ ही घंटे पहले हमसे पहली बात हो चुकी थी और response कुछ ख़ास welcoming nature kaa तो ना था पर हमने मन में इस बता को ज़ादा हवा ना दी। अब रूम दिखाने की बारी थी पर behavior वैसे का वैसा ही जैसे हम इनकी गली में ज़बरदस्ती घुस आये हो और इनकी प्राइवेसी में खलल पैदा हो गयी हो। उसके इसी behavior के कारन पुराने colleague की एक बात याद आ गयी की "तुम्हे तुम्हारे शहर में काम नहीं मिलता इसीलिए यहाँ आना पड़ता है। I feel pity for you guys" बात काफी पुरानी है पर याद रह गयी । आज उसी पर कुछ पंक्तियाँ जेहन में आती हैं :
कि चंद रुपयों कि नौकरी पे , जो तुम इतना इतरा रहे हो।
और राज्य में फैली हरियाली पे , जो तुम इतना इठला रहे हो ।।
मत भूलो कि योगदान तुम्हारा ही नहीं इसमें
एड़ियां घिसी है हमने भी ,उनके लिए जो पीढ़ी आने वाली है ।।
इस टेक्नोलॉजी के ज़माने में, हमारा राज्य ज़रा पीछे क्या रह गया
तुम समझ बैठे हो खुद को, विज्ञान और तकनीक के महारथी
फिर हे महारथी, तुम्हे ये कौन समझाए
की हम अपने राज्य के किन शिक्षित वर्ग को खाली कर आये हैं ।।
और फिर तुम्हे हम क्या समझाए ?
कि किस कुटुंब की शान -ो -शौकत छोड़ आये हैं
बस ये समझ लो कि
जब घर से निकले थे तो माँ की आँखों में आस छोड़ आये थे।।
मजबूरी हमारी कुछ ख़ास ना थी
बस इस शहर की चकाचौंध लुभा गयी थी ।।
वर्ना हमने जो पाया था वो सारा यहीं लुटाया था
यकीन नहीं तो नज़र फिरा कर देख ज़रा
या फिर पूछो अपनी बेमुरव्वत सरकारों से।।
घरों के रेंट को जिन्होंने आसमान पहुंचाया है
उसके ऊपर कैब वालों ने अमान्य किराया फ़रमाया है
टूर्स & टूरिज्म के नाम पर जो तुमने जाल बिछाया है
साधारण से होटल्स को भी महल जैसा भरमाया है
फिर उनपर 18% की GST लगा कर दिन में तारें गज़ब दिखलाया है ।।
सुबूत पेश कर रहे ये सारे के सारे ,
हमने जो पाया सारा यहीं लुटाया है।।
(और भी ऐसा बहुत कुछ है जिनसे मुझे आप्पत्ति ज़रूर है पर सारी बातें कविता में उतारना नामुमकिन है। ऐसा नहीं है की मुझे यहाँ रहना पसंद नहीं या फिर यहाँ के लोगों से किसी तरह की कोई नाराज़गी है या फिर यहाँ की सुविधाओं का मैं लुत्फ़ नहीं उठाती बस आफत इस की है कि समय से पहले ही किसी भी सुविधा का ज़रुरत से ज़ादा मूलयांकन कर देना आने वाले समय के लिए बहुत बड़ी चेतावनी है। दूसरा ये कि जिन लोगों को ऐसा लगता है कि हमें अपने राज्य में ही रह कर अपने लिए जीवन-यापन का जरिया देखना चाहिए तो ऐसी सोच रखने वालों से आग्रह है कि ये ना भूले कि ये भारत है और इस देश के किसी भी कोने में हम जा कर अपने लिए जीने का तरीका देख सकते हैं।। बता दें की ये मेरा पर्सनल ओपिनियन है । पसंद ना आये तो सीधा सीधा इग्नोर करें । )
-Shweta

