किसी की परिभाषा के शब्दों सा हो जाउ

या खुद सा ही रहूँ

'कशमकश' हैं ||


अपनी किताब के उस किरदार को,

कई बार लिखा मैंने,

जो मुझ पर ही आधारित था|

क्योकि

बिना अर्थ की कहानी और

बेतुकी शायरी

भला कौन पढ़ता हैं?


ऐसा नहीं कि मुझे उपन्यास पसंद नहीं,

बस उनकी पेचीदा उलझने

मुझे बेचैन कर देती है|


अब ये किरदार........

उपन्यास, कहानी या शायरी जो हो |

बस कशमकश से आज़ाद हो ||

उलझने हो..... पर पेचीदा ना हो

शायरी हो...... पर बेतुकी ना हो

कहानी हैं...... तो अर्थ हो |

और ये लिखते हुए 'कशमकश' हैं||