गंगा
गंगा तू मैली या मैं मैली
सोचती हूँ, तुमसे मेरे पाप धुल पाएंगे
या मेरे मैल से तुम पापिन कहलाओगी
मैल की परिभाषा समझ नहीं आती
पाप को परिभाषित तो कर तू
फिर बता कि तू मैली, या मैं मैली
मेरे कितने पाप कितने पुण्य, कोई हिसाब तो बन पाता
कोई प्रेम की भाषा समझाता तो नफरत से मेरा भी पांव बच जाता
गंगा तू मैली या मैं मैली,
कुछ फर्क समझ नहीं आता है
दोनों के गर्भ में गहराई है इतना ही दिख पाता है
हम दोनों बहती धाराएं हैं,
दोनों उलझी, मंथन करती, किनारे परखती,
मैं थम जाऊँ या, किनारा संग लिए बह निकलूँ
मैं ठहरा, गन्दला पोखर धरूं, या बाढ़ कलंकित कहलाऊँ
गंगा, उचित-अनुचित परिभाषित तो कर
और बता, तू मैली या मैं मैली
मेरे कर्मों को हिसाब तुम्हारे जल से होगा-
जल जो लील गया या जिसने जीवन दिया?
मेरे कर्मों का हिसाब न्यायोचित होगा-
न्याय जो मैंने समझा या तूने रच दिया?
गंगा, प्रश्न तो आज तेरी पवित्रता पर भी है
कि तू मैली, या मैं मैली
सोचती हूँ, तुमसे मेरे पाप धुल पाएंगे
या मेरे मैल से तुम पापिन कहलाओगी |


