नकाब,
नकाब वो जो घर में अलग और सोशल मीडिया पर अलग नजर आती है,
औरत की आवाज औऱ उसकी दहाड़ सोशल मीडिया पर तो बहुत पसंद आती है,
मगर वो आवाज खुद के घर गूंजे तो आपकी लाठी क्यों सरक जाती है?
सोशल मीडिया पर हिजड़ो की तालियां खून में तो खूब उबाल लाती है,
मगर जो सामने बज जाए मुँह से हँसी उनको देख के इतनी घृणा क्यों आती है?
हक और इंसाफ की लड़ाईयां तो आसानी से लड़कर उ"#" में प्रथा (ट्रेंडिंग) के साथ सुनवाईयां चला दी जाती है,
मगर वो जो यथार्थ में सड़कों पर एक जुट हो जाएं तो सारे सिस्टम के आंखों में क्यों कील जैसे चुभी चली आती है?
प्यार,मुहब्बत,हमदर्दी तो इस प्लेट फॉर्म पर बेशुमार लुटाई जाती है,
मगर क्या मजाल गर हकीकत में इतनी लूटा दी ही जाए तो आज किसी की जान ऐसे फंदे पर लटकर, लॉकर रूम में घुटकर,यूँ ही नहीं चली जाती है!!!


