वो घर पर करती होगी मेरा इंतज़ार...

आज आया कैसा ये तूफान बिना किए हमें आगाह...

ओढ़ी जिसने ऐसी चादर और ढक दी सारी धरती और ये नीला आसमान...

बैठे बैठे मां सोचती होगी ये कैसे बदल गया सारा जहान...

और वो करती होगी मेरा इंतज़ार...

कभी ना सोचा, कभी ना देखा, ऐसा भय जिससे मच गया है हाहाकार...

न हाथों में गन है, न है AK-47 का प्रहार...

बस एक विषाणु ने विष बनके भेज दिया हमें कारागार...

मां चश्मे को ठीक करके पढ़ती हैं उसकी खबरें बारम्बार...

और वो एक टक राह देख करती होगी मेरा इंतज़ार...

क्या सच में सड़कें खाली हैं और बंद हो गए बाज़ार...

तभी तो इस बार फीका पड़ गया होली का पावन त्यौहार...

तैयार हो गई मां की मठरी, दालमोठ, चटनी और अचार...

बिना जुर्म के लॉकअप में जाना दिल पे चला रहा है कटार...

और वो करती होगी मेरा इंतज़ार...

उतार दिया सबने अपना मुखौटा और धारण किया मास्क का हथियार...

राम - सिया के चरणों में गिर पड़े और रामायण देख रहा सारा परिवार...

मां सोच में पड़ गई ये देख के कि ये कलयुग है या कोरोना लाया है त्रेतायुग का कोई अवतार...

और वो करती होगी मेरा इंतज़ार...

इस अदृश्य बलशाली का सामना डट कर करेंगे हम बार बार...

इतिहास रच रहा है वो तो क्या? हम नहीं बैठेंगे चुपचाप...

घर पर रह कर देंगे मात उसे और कर डालेंगे चमत्कार...

क्योंकि मां सच में करती होगी मेरा इंतज़ार...

मैं भी चाहूं मां से मिलना और उनके आंचल में छुप जाना, जिससे हृदय में होता है रक्त संचार...

क्योंकि मेरे जीवन का वो हैं एक अनमोल उपचार... j

चाहूं में इस बंधन से छूटकर, उनसे मिलकर खुद से मिलना सिर्फ एकबार...

हां बिना आंसू पोंछे, दिल में कई सवाल लिए, बिना कुछ कहकर भी बहुत कुछ कहकर...

हर शाम वो करती होगी मेरा इंतज़ार...