तटस्थ
विचारों के आंदोलन
द्वन्द्व की क्रांति
अपने अन्दर जिये हैं
मैंने
कितने ही संघर्ष संचालित किये हैं
कुछ विजित
अधिकतर पराजित
अभूतपूर्व साहस- सम्बल
जो कभी स्वयं जुटाया था
जर्जर प्रतीत होता है
जब मन की उड़ान
वस्त्विकता से टकराती है
विश्वास
टूटे पंखों के समान धराशायी
होता जाता है
हाँ... अब मैं तटस्थ हूँ
सभी आकर्षणों से
अवमाननाओं से
न तो निन्दा मुझे सताती है
और
न अभिनन्दन ही मधुर लगता है
जीना सीख लिया है मैंने
(अब नीचे से ऊपर तक पढ़िए)
-Shweta Gupta ✍


