आत्मसात कर लिया मैंनें
गीता के उपदेश को
सदा कर्म को
प्रधान मान कर मैंने
कभी भी
स्वार्थ के वशीभूत होकर
तजा नहीं मैंने
अपना धर्म
निस्संदेह...
एक दर्द सा महसूस
किया था मैंने
जब देखा जग को
स्वार्थ में अंध
या कदाचित
विवेकशून्य
(अब नीचे से ऊपर तक पढ़िए)


आत्मसात कर लिया मैंनें
गीता के उपदेश को
सदा कर्म को
प्रधान मान कर मैंने
कभी भी
स्वार्थ के वशीभूत होकर
तजा नहीं मैंने
अपना धर्म
निस्संदेह...
एक दर्द सा महसूस
किया था मैंने
जब देखा जग को
स्वार्थ में अंध
या कदाचित
विवेकशून्य
(अब नीचे से ऊपर तक पढ़िए)