एक सप्ताह बाद होली है। आज घर में सब व्यस्त हैं, गुझिया जो बनानी है।
रसोई घर में कढ़ाई पर पापा एक फौजी की भांति तैनात थे। उन्हें गुझिया तलनी थीं।
रोहित नारियल घिस रहा था।
शालू बादाम गिरी काट चुकी थी, अब मावे में मिलाने की तैयारी कर रही थी।
माँ अल्हड़ सी शालू को समझा रही हैं कि मैदा में मोयन कितना डालना है।
"शालू ध्यान से समझ अगर मोयन सही से नहीं डला तो गुझिया खस्ता नहीं बनेंगी।"
मन ही मन में बुदबुदाते हुए, "नहीं समझी तो ससुराल में जाकर नाक कटा देगी मेरी। सब कहेंगे माँ ने कुछ नहीं सिखाया।"
"समझ गयी माँ, आप परेशान न हों।"
मैदा गूंथते ही, माँ बैठ गयीं चकला बेलन लेकर। शालू के हाथ में आ गया गुझिया बनाने का साँचा। माँ गुंथी हुई मैदा के छोटे छोटे पेड़े बनाकर बेल रहीं थीं। शालू उनमें भराई कर रही थी। रोहित भरी हुयी गुझिया लेकर पापा के पास जा रहा था और पापा हर साल की तरह ही उन्हें तल रहे थे।
न जाने कितने सालों से ये सब ऐसे ही होता था, पर आगे ऐसा नहीं होगा क्योंकि इस साल शालू की शादी होने वाली थी।
शालू को छेड़ते हुए रोहित बोला, "दीदी अगले साल भी गुझिया बनवाने आ जाना।"
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एक सप्ताह बाद शालू की ससुराल में पहली होली है। सासू माँ और शालू छत पर बैठे थे, बरगुले बनाने के लिए। गोबर में हाथ डालते ही शालू को घिन आ रही थी, पर...!
सासू माँ समझाती जा रहीं थीं, "ये सूरज है, ये चँदा है....।"
साथ ही बुदबुदाते हुए बोल रहीं थीं, "माँ ने कुछ नहीं सिखाया।"
"मम्मी जी गुझिया कब बनेगी", शालू ने उत्सुकता से पूछा।
सासू माँ का पारा चढ़ गया। "जब देखो खाने की पड़ी रहती है। बाज़ार से आ जाएँगी गुझिया।"
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एक सप्ताह बाद होली है। विद्यालय में परीक्षा चल रही है। शालू बहुत व्यस्त है। घर आते हुए भी लगभग रोज़ देर हो जाती है।
"माँ मुझे गुलाल, रंग और पिचकारी लेने हैं", घर आते ही अनु ने शालू से कहा।
"ठीक है बेटा, कल रविवार है, हम दोनों बाज़ार चलेंगे। पूजा के लिए बरगुले, सबके खाने के लिए गुझिया और आपके लिए गुलाल, रंग और पिचकारी ले आएँगे।"
माँ बनने के बाद शालू ने जाना के होली मात्र गुझिया और बरगुले नहीं, रंगोत्सव भी है।
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