गौरैया...
याद है, कभी तुम आती थीं
मेरे घर में
बैठती थीं...
शहतूत के पेड़ की शाखाओं पर
फुदकती थीं...
आँगन में
एक नन्हा सा घोंसला बनाती थीं
कभी खिड़की के ऊपर,
कभी रोशनदान में
बहुत बार देखा था मैंने
तुम्हें दाना खिलाते हुए...
अपने शावकों को
नाराज़ हो क्या मुझसे
जो अब आती ही नहीं
होना भी चाहिए
यह हक है तुम्हारा
क्योंकि अब मेरे घर में
न शहतूत का पेड़ है
न आँगन है
न खिड़की है
न रोशनदान है
वो क्या है न
मेरे शहर का विकास
तुमसे ज्यादा जरूरी था
प्यारी गौरैया...
-Shweta Gupta ✍


