धुंध का विशाल सागर छाया है

स्पष्ट कुछ दिखाई नहीं देता

मात्र हमें सुनाई देती हैं

कुछ क्षीण ध्वनियाँ

आपसी द्वेष की

वैमनस्य की

लोभ की

घृणा की

ओह!

शीत हो गए हैं

मनुष्य के हृदय 

इस वर्ष शरद ॠतु

कदाचित कुछ अधिक शीतल है


(अब नीचे से ऊपर तक पढ़िए)