सोचते थे कि मुस्कुराकर जीना ही है जिंदगी, 

पर मुस्कुराने पर ही एतराज़ करते है सभी । 


खुद कि हँसी को तो नज़र ना लगे कभी ,

पर दूसरों की हँसी को नज़र लगाते हैं सभी ।


ख़ुद तो मर-मर कर जीते है लोग,

दूसरों से भी यही उम्मीद करते है लोग ।


खाई हो मुस्कुराकर जीने की क़सम किसी ने,

तो मर-मर कर जीने वालों को भी हँसा देते हैं लोग ।


लोग कहते है की धीरे हँसना है संस्कारों कि पहचान,

पर हम कहते हैं की खुलकर हँसना है भगवान के संस्कारों का मान । 


इस बात को अगर इंसान ले मान ,तो हो जाएगा हर दुख का निदान ,