मैं देखना चाहता हूँ वो नदी जो निकलतीं हैं अपने गर्भ से और मोड़ लेती हैं अपनी धारा और गिर पड़ती हैं धरातल की पृष्ठ भूमि पर कभी तय नहीं होता उसका ठहरना अमोघ बहती हैं धरातल पर. वो तय नहीं करती अपनी सीमाएं ना ही तय होता हैं उसका विलय.अनत से अनत तक की इस यात्रा में नहीं चाहती वो किसी का साथ हम मानवता की सुगमता के लिए हम बाध लेते हैं उसकी धारा और बना लेते है बांध मोड़ देते हैं उसका रास्ता कर लेते है स्नान हो जाते हैं पवित्र?