इक शाम यूं ही बैठे-बैठे, देखते हुए ढ़लते सूरज को लगा मानो अस्त होता दिन मुझसे कुछ कह रहा हो, मुझे ढाँढ़स बंधाता हो, दिन भर के जख्मों पर मरहम लगाता हो समेटता हो मुझे मेरी बिखरी हुई जिंदगी से, आंँसू पोंछते हुए मेरे गमों को साथ ले जाता हो । समझाता हो मानो मैं फिर आऊँगा, लेके नयी आश जगाकर मुझमें विश्वास, फिर से जीवन जीने को पर,जब तक हो पाया,इन बातों मुझपे असर न जाने कहाँ खो गया मेरा साथी,मेरा हमसफ़र (शाम)