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तो चलूॅं

मैं खोज में उस लक्षय के

अब दौड़ जाऊॅं हो खड़ी ।

रास्तों से बैर हो

रुकूॅं ना अब फिर कहीं ‍।


खौफ खा सफर कहे

"मंजिल को तू तो है बनी" ।

काली सी इस रात में

बिजली बनी गिरूॅं कहीं ।


शर्त लगा बैठूॅं मैं

इन तारों से इक नई ।

'चमक देखो तेज़ किसकी

तुम भी वहीं हम भी यहीं'।


उठ खड़ी हूॅं इस चाह को

तो याद आती है घड़ी ।

नहीं अभी यह वक्त मेरा

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