अनबनी सी कुछ

अपने ही विचरों में

किधर का यह रुख

मेरे इन ख्यालों में ।


जो नहीं शायद मेरा

वो ख्वाब बसर करता है

इस जीत में कुछ हार का

मलाल शसर करता है ।


मैं, मै को रोकती

हर मोड़ से हूँ मुड़ गई 

अहम की कटार पर

हर शक्स सहर करता है ।


चिंगारियाँ भी भड़के हैं 

मीठे दरिया में कहीं 

जलजीव ,सूखे के लिए

आपस में बहस करता है ।


बस श्वास का खेल है

जीवित और मृत्य में

छीलने को रूह यह

नहीं कोई कसर करता है ।


सोचती हूँ छोड़ दूँ

 अपनी कलम का खेल यह

मर्ज़ी से कब कोई

अपनो को विदा करता है ।


जीये जाते हैं हम भी

कि मर जाइंगे एक दिन

कोई नहीं यहाँ जी 

भरके जीया करता है ।।



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UNTIL WE MEET NEXT